भद्रेश्वर जैन तीर्थ (Bhadreshwar Jain Tirth)

भद्रेश्वर जैन तीर्थ (Bhadreshwar Jain Tirth)

भद्रेश्वर जैन तीर्थ (Bhadreshwar Jain Tirth), जिसे वसई जैन मंदिर या भद्रेश्वर जैन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, गुजरात के कच्छ जिले में मुंद्रा तालुका के भद्रेश्वर गांव में स्थित एक प्राचीन और महत्वपूर्ण जैन तीर्थ स्थल है। यह स्थान समुद्र तट से महज एक किलोमीटर दूर है और जैन धर्म के प्रमुख तीर्थक्षेत्रों में से एक माना जाता है। इसका प्राचीन नाम भद्रावती था, जिसका उल्लेख महाभारत काल तक जाता है।

यह तीर्थ जैन अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र है, जहां हजारों वर्ष पुरानी मान्यताओं और इतिहास से जुड़े अवशेष मौजूद हैं। कई स्रोतों के अनुसार, यह भारत के सबसे पुराने जैन मंदिरों में से एक है, जिसकी स्थापना या प्रारंभिक निर्माण 516 ईसा पूर्व (वीर निर्वाण संवत 12) में राजा सिद्धसेन के शासनकाल में माना जाता है।

इतिहास और महत्व

  • मंदिर की नींव एक जैन भक्त देवचंद्र ने सदियों पहले रखी थी।
  • 13वीं शताब्दी में जैन व्यापारी जगदूषा ने इसका बड़े पैमाने पर जीर्णोद्धार किया, जिसके बाद इसमें 52 देव-कुलिकाओं (छोटे मंदिरों) का विस्तार हुआ।
  • मंदिर को कई बार भूकंपों (जैसे 1819, 1844-45, 1875 और विशेष रूप से 2001 के गुजरात भूकंप) से भारी क्षति पहुंची, लेकिन हर बार इसका पुनर्निर्माण हुआ। 2001 के भूकंप में पुराना ढांचा पूरी तरह नष्ट हो गया था, जिसके बाद इसे नए सिरे से सफेद संगमरमर से बनाया गया।
  • यहां पार्श्वनाथ भगवान की प्राचीन मूर्ति (करीब 2500 वर्ष पुरानी मानी जाती है) का विशेष महत्व है, हालांकि मुख्य मंदिर में वर्तमान में अजितनाथ (केंद्रीय), शांतिनाथ और सात फनों वाले पार्श्वनाथ की सफेद संगमरमर की मूर्तियां स्थापित हैं।
  • यह स्थान जैन इतिहास में कई राजाओं, जैसे सम्राट सम्प्रति, वनराज चावड़ा आदि से जुड़ा है और जैन ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।

यहां देखें कुछ आकर्षक दृश्य, जहां सफेद संगमरमर की भव्य वास्तुकला और नक्काशी दिल मोह लेती है:

ये तस्वीरें मंदिर की शानदार वास्तुकला, मुख्य गुंबद और आंतरिक सुंदरता को दर्शाती हैं। मंदिर दिलवाड़ा जैन मंदिरों (माउंट आबू) की शैली से प्रेरित है, जिसमें तीन गुंबद, स्तंभों वाली संरचना और जटिल नक्काशी है।

वास्तुकला और विशेषताएं

  • मुख्य मंदिर सफेद संगमरमर से बना है, जिसमें भव्य स्तंभ और तीन गुंबद हैं।
  • परिसर में 52 छोटे मंदिर (देव-कुलिकाएं) हैं, जो मुख्य मंदिर को घेरे हुए हैं।
  • प्रवेश द्वार से ही भगवान की मूर्तियां दिखाई देती हैं, जो जैन मंदिरों की खासियत है।
  • यहां एक धर्मशाला भी है, जहां जैन यात्री ठहर सकते हैं (गैर-जैन रात गुजारने की अनुमति नहीं है)।

कैसे पहुंचें?

  • निकटतम शहर: भुज (लगभग 75 किमी), गांधीधाम (रेलवे स्टेशन)।
  • सड़क मार्ग: भुज से बस या टैक्सी से आसानी से पहुंचा जा सकता है।
  • सर्वश्रेष्ठ समय: अक्टूबर से मार्च (शीतकालीन मौसम में यात्रा सुविधाजनक)।

भद्रेश्वर जैन तीर्थ न केवल धार्मिक महत्व का है, बल्कि भारतीय इतिहास, वास्तुकला और सहिष्णुता का जीवंत प्रतीक भी है। यहां शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव अविस्मरणीय रहता है। जय जिनेंद्र! 🙏

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