शिखरजी की प्रमुख टोंकें और तीर्थंकर (मोक्ष स्थान)

शिखरजी की प्रमुख टोंकें और तीर्थंकर (मोक्ष स्थान)

24 तीर्थकारों के गणधरों की कूट

चौबीसो ं जिनराज के, गण नायक ह ै ं जेह। मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।।

ॐ श्री गौतम स्वामी आद ि गणधर देव ग्राम के उद्यान आद ि भिन्न-भिन्न स्थानो ं से निर्वाण पधारे हैं तिनके चरणारविन्द को मेरा मन, वचन काय से बारम्बर नमस्कार हो, जलादि अर्ध निर्वपामीति स्वाहा ।।

1) ज्ञानधर कूट (श्री कुन्युनाथ)

जल चंदन तंदुल प्रसून चरु, दीप धूप लेरी । फलजुत जजन करो ं मनसुख धरि, हरो जगत फेरी। कुथ ु सुन अरज दासकेरी, नाथ सुन ि अरज दासकेरी। भवसिन्धु परयो हो नाथ, निकारो बांह पकर मेरी।

प्रभु सुन अरज दासकेरी, नाथ सुन ि अरज दासकेरी। ॐ ह्रीं श्री कुन् नाथय जिनेन्द्राय अन पद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।

सुदी बैशाख सु एकम नाम । लियौ तिहि घौस अनय शिवधाम । जजै हरि हर्सित मंगल गाय। समन्वर्तु हो तुहि मन वच काय। ॐ ह्रीं बैशाखशुक्लप्रतिपदाया ं मोक्ष मंगल प्राप्ताय श्री कुथुनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

कुन् नाथ जिनराज का, कूट ज्ञान घर जेहा मन वच तन कर पूजहें, शिखर सम्मेद यजेह। ॐ ह्रीं श्री कुन्थनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 96 कोड़ा कोड़ी 96 करोड़ 32 लाख 96 हजार 742 मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बर नमस्कार हो जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है।

2) मित्रधर कूट (श्रीनमिनाथ)

जलफलाद ि मिनाय मनोहर, अरघ धारत ही भवभय हर। जजतु हों नमिके गुधगायकें, जुगपदाम्बुज प्रीति लगायकें ।।

ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथ जिनेन्द्राय अन पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।

वैशाख चतुर्दश श्यामा । हन ि शेष वरी शिववामा ।। सम्मेदथ की भगवन्ता । हम पूज े ं सुगुन अनन्ता ।। ॐ ह्रीं वैशाखकृष्णचतुर्दश्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्री नमिनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

नमिनाथ जिनराज का, कूट मित्रधर जेह । मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री नमिनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 9 कोड़ा कोड़ी । अरब 45 लाख 7 हजार 942 मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बर नमस्कार हो जलाधि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड़ उपवास का फल होता है।

3) नाटक कूट (श्री अरहनाथ)

अरहनाथ जिनराज का, नाटक कूट है जेह।

सुच ि स्वच्छ पटीरं गंध गहीरं तंदुल शीरं पुष्प च । वर दीप धूपं, आनन्द रूप, लै फल भूपं अर्घ करूं ।। प्रभू दीन दयाल, अरिकुल कालं, विरद विशाल ं सुकुमालम हन ि मम जंजालं, हे जगपालं, अरगुन मालं वरभालम ।। ॐ ह्रीं श्री अरहनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामीति स्वाहा ।।

चैत कृष्ण अमावसी सब कर्म । नाशि वास किय शिव-थल पर्म ।। निहचल गुन अनंत भंडारी । जजो ं देव सुध ि लेहु हमारी ।। ॐ ह्रीं चैतकृष्णामावस्यां मोक्षमंगलमंडिताय श्री अरहनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवे

मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री अरहनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 99 करोड 99 लाख 99 हजार 999 (यान ि 1 कम 1 अरब मुन ि मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बर नमस्कार हो जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से 96 करोड़ उपवास का फल होता है।

4) संवल कूट (श्रीमल्लिनाथ

जल फल अरघ मिलाय गाय गुण, पूजा भगति बढ़ाई। शिवपदराज हेत हे श्रीधर शरण गही म ै ं आई ।। राग दोष मद मोह हरनको, तुम ही हो वरवीरा। यातें शरन गही जगपति जी, वेग हरो भवपीरा ।। ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामीति स्वाहा ।।

फाल्गुनी सेत पांच अघाती हते । सिद ्ध आल ै बस े जाय सम्मेदतें इन्द्रनार्गेन्द्र कीन्हीं क्रिया आयकें। म ै ं जजों शिव मही ध्यायकें गायकें। ॐ ह्रीं फाल्गुन शुक्लपंचम्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

मल्लिनाथ जिनराज का, संवल कूट है जेह।

मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ही श्री मल्लिनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 96 करोड मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बर नमस्कार हो जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड़ प्रोषध उपवास का फल होता

5) संकुल कूट (श्रीश्रेयासनाथ)

प्राप्तये अर्ध निर्वपामीति स्वाहा ।।

जलमलय तंदुल सुमनचरु अरु दीप धूप फलावली। करि अरघ चरचों चरन जुग प्रभु मोह ि तार उतावली।। श्रेयांसनाथ जिनन्द त्रिभुवन वन्द आनन्दकन्द हैं। दुखदंद फंद निकंद पूरनचन्द जोति अमंद हैं। ॐ ह्रीं श्री श्रेयासनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद

गिरिसमेदतें पायो, शिवथल तिथि पूर्णमास ि सावनको । कुलिशायुध गुनगायो, मै पुजा आपनिकट आवनको ।। ॐ ह्रीं श्रावणशुक्लपूर्णिमायां मोक्षमंगलमंडिताय श्री श्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

श्रेयाँसनाथ जिनराज का, संकुल कूट धर जेहा मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।।

म्बर नमस्कार हो जलाधि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

ॐ ह्रीं श्री श्रेयाँसानाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 96 कोड़ा कोड़ी 96 करोड़ 96 लाख १ हजार 542 मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बर नमस्कार हो

जलाधि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा। इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड़ प्रोषध का फल मिलता है।

6) सुप्रभ कूट (श्री पुष्पदन्त)

जलफल सकले मिलाय मनोहर, मनवचतन हुलसाय । तुमपद पूजो ं प्रीतिलायकै, जय जय त्रिभुवनराय ।। मेरी अरज सुनीजे, श्री पुष्पदन्तजिनराय जी, मेरी अरज सुनीज े । ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा

पुष्पदंत जिनराज का, सप्रभ कट धर जेह।

भादव सित सारा आठे ं धारा, गिरिसमेद निरवाना जी। गुन अश्ट प्रकारा अनुपम धारा । जय जय कृपा निधानजी ।। तित इन्द्र सु आयो, पूज रचायौ, चिंह तहां करि दीना है। मै ं पूजत हों गुन ध्यान महीसौं, तुमरे रसमें भीना ह ै ।। ॐ ह्रीं भादवशुक्लाष्टम्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्री पुष्पदन्त जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं पुष्पदंत जिनन्द्राद ि मुन ि 1 कोड़ा कोड़ी 99 लाख 7 हजार 780 मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बर नमस्कार हो जलाधि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड़ उपवास का फल होता है।

7) मोहन कूट (श्रीपद्मप्रभु)

ॐ ह्रीं श्रीपदमप्रभु जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

पदमप्रभु जिनराज का, मोहन कूट धर जेह ।

जल फल आद ि मिलाय गाय गुन, भगत भाव उमगाय । जजो ं तुमहिं शिवतिय वर जिनवर, आवागमन मिटाय ।। पूजो ं भावसों, श्रीपद्मनाथपद सार, पूजो ं भावसों ।।

असित फागुनचौथ सुजानियो। सकलकर्म महारिपु हानियों। गिरसमेद थकी शिवको गये। हम जज ै पदध्यानविषै लये ।। ॐ ह्रीं फाल्गुन कृष्णचतुर्थीदिने मोक्षकल्याणप्राप्ताय श्रीपद्मप्रभु जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री पदमप्रभु जिनेन्द्राद ि मुन ि 99 करोड 87 लाख 43 हजार 747 मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलाधि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है।

8) निरजर कूट (श्रीमुनिसुब्रतनार्थ)

जलगंध आद ि मिलाय आठो ं दरब अरघ सजों वरों। पूज चरनरज भगतिजुत, जातें जगत सागर तरौं । शिवनाथ करत सनाथ सुवतनाथ, मुनिगुन माल हैं। तसु चरन आनन्दभरन तारन, तरन, विरद विशाल हैं। ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुब्रतनार्थ जिनेन्द्राय अन पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

वदि बारसि फागुन मोक्ष गये। तिहुं लोक शिरोमणि सिद ्ध भये। सु अनन्त गुनाकर विघ्न हरी। हम पूजत ह ै ं मनमोद भरी ।। ॐ ह्रीं फाल्गुन कृष्णद्वादश्यां मोक्षकल्याणप्राप्ताय श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवे

मुनिसुब्रत जिनराज का, निरजर कूट है जेह । मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री मुनिसुब्रतनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 99 कोड़ा कोड़ी 99 करोड़ 99 लाख 999 मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा वचन काय से बारम्बर नमस्कार हो जलाद ि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड़ प्रोषध का फल होता है।

9) ललित कूट (श्री चन्द्रप्रभु)

सज ि आठों अरब पुनीत, आठों अंग नमों, पुजों अष्टम जिन मीत, अष्टम अवनि गमों। श्री चन्द्रनाथ दुति चन्द, चरनन चन्द लगे, मन वच नत जजत अमंद आतम जोति जग ै ।। ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभु जिनेन्द्राय

अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

श्री चन्द्रप्रभु जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

चन्द्रप्रभु जिनराज का, ललित कूट है जेह ।

शुक्ला फाल्गुन सप्तमिके दिन, ललितकूट शुभ उत्तम थान । श्रीजिन चन्द्रप्रभु जगनामी, पायो आतम शिव कल्याण । वसु कर्म जिनचन्द्र ने जीते, पहुच े स्वामी मोक्ष मंझार। निर्वाण महोत्सव कियो इन्द्र ने, देव करे ं सब जय जयकार। ॐ ह्रीं फाल्गुनशुक्लसप्तम्यां मोक्षकल्याणप्राप्ताय

मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभु जिनेन्द्राद ि मुन ि 984 अरब 12 करोड़ 80 लाख 84 हजार 595 मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो

जलाधि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड़ उपवास का फल मिलता है।

10) आदिनाथ भगवान की टोंक

शुचि निर्मल नीर गंध सुअक्षत, पुष्प चरू ले मन हरषाया। दीप धूप फल अर्घ सुलेकर, नाचत ताल मृदंग बजाय ।। श्री आदिनाथजीके चरण कमल पर, बलि बलि जाऊ ं मनवचकाय । हो करुणनिधि भव दुःख मेटो, वातें म ै ं पूजो ं प्रभुजी के पाव ।। ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

माघ चतुर्दशि कृष्ण की, मोक्ष गय े भगवान । भवि जीवों की बोधिके, पहुंच े शिवपुर धाम ।। ॐ ह्रीं माघ कृष्णचतुर्दश्यां मोक्षकल्याण प्राप्ताय श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

ऋषभदेव जिनराज सिद ्ध भए, गिरि कैलाश से जोय ।

मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राद ि 10 हजार मुन ि कैलाश से मोक्ष गए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हा जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

11) विद्युतवर कूट (श्रीशीतलनाथ)

कश्री फलाद ि वसु प्रासुक द्रव्य साजै। नाच े रचे मचत बज्जत सज्ज सा ।। रागादि दोष मल मर्दन हेतु येवा । चचो ं पदाब्ज तन शीतलनाथ देवा ।

ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

कुवार की आठें शुद्ध बुद्धा, भय े महामोक्ष सरुप शुद्धा। सम्मेदतें शीतलनाथ स्वामी, गुनाकरं तास ु पद ं नमामी ।। ॐ ह्रीं आश्विनशुक्लाष्टम्यां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवे

शीतलनाथ जिनराज का, विद्युत कूट है जेह । मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री शीतलनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 18 कोड़ा कोड़ी 42 करोड़ 32 लाख 42 हजार 905 मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बर नमस्कार हो जलाधि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड़ उपवास का फल प्राप्त होता है।

12) स्वयंभूवर कूट (श्रीअनन्तनाथ)

शुचिनीर चन्दन शलिशन्दन, सुमन चरु दीवा धरों। अरुधूपफलजुतअरघकरिकर, जारजुगविनतीकरों ।। जगपूज परम पुनीत मीत, अनन्त सन्त सुहावनों । शिव कंत वंत महंत ध्यावों, भ्रन्त वन्त नशावनों ।। ॐ ह्रीं श्री अनन्तनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।

असित चैत अमावस गाइयौ, अघत घाति हन े शिव पाइयो। गिरि समेद जज ैं हरि आयकें, हम जज ै ं पद प्रीति लगाइकें ।। ॐ ह्रीं चैतकरणामावस्यां मोक्षमंगलमंडिताय श्री अनन्तनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवे

अनन्तनाथ जिनराज का, कूट स्वयंभ ू है जेह। मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री अनन्तनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 96 कोड़ा कोड़ी 70 करोड़ 70 लाख 70 हजार 700 मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना करने से एक करोड़ उपवास का फल होता है।

13) धवल कूट (श्री संभवनाथ)

जल चंदन तंदुल प्रसून चरु, दीप फल अर्ध किया। तुमको अरपों भाव भगतिधर, जै ज ै जै शिवरमनिपिया।। संभवजिनके चरन चरचतें, सब आकुलता मिट जावै । निजिनिधि ज्ञान दरश सुखवीरज, निराबाध भविजन पाव ै ।। ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

चैतशुक्ल तिथि षष्ठी चौख। गिरसम्मेदतें लीनो ं मोख । चार शतक धनु अवगाहना। जजौ ं तासपद थुतिकर घना ।। ॐ ह्रीं चैतशुक्लषष्टीदिने मोक्षमंगलप्राप्ताय श्री संभवनाथ जिनेन्द्राय अर्ध निवेः

सम्भनाथ जिनराज का, धवल कूट है जेह। मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री सम्भवनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 9 कोड़ा कोड़ी 12 लाख 42 हजार 500 मुन ि इस कूट से मोक्ष भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलाद ि

अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना से 42 लाख उपवास का फल होता है।

14) श्रीवासुपूज्य भगवान

की टोंक जलफल दरब मिलाय गाय गुन, आठों अंग नमाई। शिवपदराजहेतु हे श्रीपति ! निकट धरों यह लाई ।। श्री वासुपूज वसुपूज तनुज पद, वासव सेवत आई। बालब्रह्मचारी लखि जिनको, शिवतिय सनमुख धाई ।। ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्य जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

सित भादव चौदस लीनो ं । निरवान सुथान प्रवीनों। पुर चुपाथानक सेती। हम पूजत निज हित हेती ।। ॐ ह्रीं भादवशुक्लचतुर्दश्यां मोश्रमंगलप्राप्ताय श्रीवासुपूज्य जिनेन्द्राय अर्धे निवे

वासुपूज्य जिन सिद ्ध भए, चम्पापुर से जेह। मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्य जिनेन्द्राद ि चम्पापुर मंदारगिरि से एक हजार मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।

15) आनन्द कूट (श्री अभिनन्दननाथ)

अष्टद्रव्य संवारि सुन्दर सुजस गाय रसाल ही। नचत रचत जजो ं जरनजुग, नाय नाय सुभाल ही ।। कलुषताप निकंद श्री अभिनन्द, अनुपम चन्द है। पदवंद वृन्द जज े प्रभू, भवदंद फंद निकद हैं।। ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दन जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

जोग निरोध अघातिघाति लहि, गिरसमेदतें मोख । मास सकल सुखराम कहे, बैशाख शुक्ल छठ चोख ।। चतुरनिकाय आय तित कीनो, भगत भाव उमगाय । हम पूजत इत इरघ जिमि, विघ्न सघन मिट जाय।। ॐ ह्रीं बैशाखशुक्लषष्ठीदिने मोश्रमंगलप्राप्ताय श्री अभिनन्दननाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

अभिनन्दन जिनराज का, आनन्द कूट है जेह । मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दननाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 72 कोड़ा कोड़ी 70 करोड़ 70 लाख 42 हजार 700 मुन ि इस कूट से मोक्ष भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना से एक लाख उपवास का फल होता है।

16) सुदत्तवर कूट (श्रीधर्मनाथ)

आठो ं दरब साज शुचि चितहर, हरषि हरषि गुनगाई। बाजत दृम दृम दृम मृदंग गत, नाचत ता थेइ थाई ।। परमधरम-शम रमन-धरम-जिन, अशरन शरन निहारी। पूजो ं पाय गाय गुन सुन्दर, नाचौ ं द ै द ै तारी ।। ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

जेठशुक्ल तिथि चौथ की हो। शिव समेदत ै पाय ।। जगतपूजपद पूज । पूजो ं हो अबार धरमजिनेसुर पूज हो पूजी हो अबार ॐ ह्रीं ज्येष्ठशुक्लचतुर्दश्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय

श्रीधर्मनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

धर्मनाथ जिनराज का, कूट सुदत्तवर है जेह । मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री धर्मनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 29 कोड़ा कोड़ी 19 करोड़ 9 लाख 9 हजार 765 मुन ि इस कूट से मोक्ष भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना से एक करोड़ उपवास का फल होता है।

17) अविचल कूट (श्रीसुमतिनाथ)

जल चंदन तंदुल प्रसून चरु दीप धूप फल सकल मिलाय । नाच ि राचि शिरदाय समरचों, जय जय जय 2 जिनराय ।। हरिहर वंदित पापनिकंदित, सुमतिनाथ त्रिभुनवके राय । तुम पद पघ समशिवदायक, जजत मुदितमन उदित सुभाय ।। ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

चैत शुक्ल ग्यारस निरवानं । गिरिसमेदत्तें त्रिभुनव मान ं ।। गुन अनन्त निज निरमलधारी । जजो देव सुधिलेहू हमारी ।। ॐ ह्रीं चैतशुक्लैकादश्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्री सुमतिनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

सुमतिनाथ जिनराज का, अविचल कूट है जेह। मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री सुमतिनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 1 कोड़ा कोड़ी 84 करोड़ 72 लाख 81 हजार 781 मुन ि इस कूट से मोक्ष भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना से 9 करोड़ 32 लाख उपवास का फल होता है।

18) कुन्दप्रभु कूट (श्रीशान्तिनाथ)

जल फलाद ि वसु द्रव्य संवारे, अर्ध चढ़ाय े मंगल गाय। बखत रतन के तुम ही साहिब दीज े शिवपुर राजकराय ।। श्री शांतिनाथ पंचम चक्रेश्वर द्वादश मदन तनो पद पाय । तिन के चरण कमल के पूज े रोग शोक दुःख दारिद जाय ।। ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

सम्मेद शैलभरी, हन कर अघाति मोक्ष जिन पाई। जेठ चतुर्दशि-कारी, म ै ं पूज ू ं सिद्धाथान सुखदाई ।। ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णचतुर्दश्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

शांतिनाथ जिनराज का, कुन्दप्रभ कूट है जेह। मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 9 कोड़ा कोड़ी 9 लाख 9 हजार 999 मुन ि इस कूट से मोक्ष भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलाद ि

अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना से 1 करोड़ उपवास का फल होता है।

19) श्रीमहावीर भगवान की टोंक

महावीर जिन सिद ्ध भए, पावापुर से जेंह।

जलफल वसुसज ि हिमथार, तन मन मोद भरों, गुण गाउ ँ भवदध ि तार पूजत पाप हरों। श्री वीर महा अतिवीर सन्मति नायक हो, जय वर्धमान गुणधीर सन्मति दायक हो ।। ॐ ह्रीं श्री महावीर जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्रसप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

कार्तिकश्याम अमावस शिवतिय, पावापुरतें वरना। गणफनिवन्द जजै तित बह विध, म ै ं पूजो ं भयहरना। नाथ मोहि राखो हो सरना, श्री वर्द्धमान जिनरायजी मोहिराखो सरना ।। ॐ ह्रीं कार्तिककृष्ण अमावस्यां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीमहावीर जिनेन्द्राय अर्धे निर्वपामिति

मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेदयजेह ।। ॐ ही श्री महावीर स्वामी पावापुर के पदम सरोवर स्थान से 26 मुन ि सहित मोक्ष पधारे तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

20) प्रभास कूट (श्रीसुपार्श्वनाथ) आठो

ं दरब साज ि गुनगाय, नाचत राचत भगति बढ़ाया। दयानिधि हो, जय जगबंध ु दयानिधि हो ।। अजि तुम पद पूजो ं मनचनकाय, देव सुपारस शिवपुरराय। दयानिधि हो, जय जगबंध ु दयानिधि हो ।। ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

असित फागुण सातय पावनों। सकल कर्म कियो छय भावनों गिरिसमेदथकी शिव जात ु हैं, जजत ही सब विघ्न विलातु हैं।

ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णसप्तमीदन े मोकल्याणप्राप्ताय

श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्ध निवैः

सुपार्श्वनाथ जिनराज का, प्रभास कूट है जेह।

मन वच तन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 49 कोड़ा कोड़ी 84 करोड़ 72 लाख 7 हजार 742 मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना से 32 करोड़ उपवास का फल होता है।

21) सुवीर कूट (सकुल कूट) (श्रीविमलनाथ)

ॐ ह्रीं श्री विमल जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

आठो ं दरब संवार, मन सुखदायक पावने । जजों अरघभरथार, विमलविमल शिवतिय रमण ।।

भ्रमरसादरसी अति पावनों । विमल सिद ्ध भय े मन भावनों। गिरसमेद हरी तित पूजिया। हम जज ै ं इत हर्ष धरें किया।। ॐ ह्रीं आसाढ़कृष्णषष्ठया मोक्षमंगलप्राप्ताय

श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवे

विमलनाथ जिनराज का, सुवीर कूट है जेह।

मन वच तन कर पूज हूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री विमलनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि 70 कोड़ा कोड़ी 60 लाख 6 हजार 742 मुन ि इस कूट से शिवपुर पधारे तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना से एक करोड़ उपवास का फल होता है।

22) सिद्धवर कूट (श्री अजितनाथ)

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।

अजितनाथ जिनराज का, सिद्धवर कूट है जेह ।

जल फल सब सज्जे, बाजत बज्ज े गुनगानरज्ज े मनरज्जे। तुअ पदजुगमज्जे, सज्जन जज्ज े ते भव भज्जे निजकज्ज े ।। श्रीअजित जिनेश, नूतनाकेश चक्रधरेश खग्गेश । मनवाछितदाता, त्रिभुवनत्राता, पूजो ं ख्याता जग्गेश ं ।।

पंचम ि चैतसुदी निरवाना। निजगुनराज लियो भगवाना ।। इन्द्र फनिंद जजें तित आई। हम पद पूजत है गुनगाई।। ॐ ह्रीं चैतशुक्लपंचमीदिने निर्वाणमंगलप्राप्ताय श्री अजितनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवे

मन वचतन कर पूजहूँ, शिखर सम्मेद यजेह ।। ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्राद ि मुन ि एक अरब 80 करोड़ 54 लाख मुन ि इस कूट से सिद ्ध भए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलाद ि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

इस टोंक की भाव सहित वन्दना से 32 करोड़ उपवास का फल होता है।

23) श्री नेमिनाथ भगवान की टोंक (श्रीनेमिनाथ)

जल फलाद ि साज शुचि लीने, आठो ं दरब मिलाय । अष्टमछितिके राजकरन कों, जजौ ं अंग वसुनाय ।। दाता मोक्षके श्रीनेमिनाथ जिनराय, दाता मोक्षके। ॐ ही श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

सितषाढ ़ अष्टमी चूरे । चारों घातिया करे। शिव ऊर्जयन्ततें पाई। हम पूज ें ध्यान लगाई ।। ॐ ह्रीं आसादशुक्ला अष्टम्या मोक्षमंगलप्राप्ताय श्रीनेमिनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

नेमिनाथ जिन सिद ्ध भए, सिद्ध क्षेत्र गिरिनार।

मन वच तन कर पूजहूँ, भवदध ि पार उतार।। ॐ ह्रीं श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राद ि शम्बू, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध इत्याद ि 72 करोड़ सात सौ मुन ि गिरिनार पर्वत से मोक्ष गए तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलादि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

24) स्वर्णभद्र कूट (श्री पार्श्वनाथ)

नीरगंग अक्षतान पुष्प चारु लीजिये, दीप धूप श्रीफलादि अर्ध त जजीजिये। श्री पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूँ सदा, दीजिये निवास मोक्ष भूलिये नही ं कदा ।। ॐ ह्रीं पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अनर्थ्य पद प्राप्तये अर्ध निर्वपामिति स्वाहा।

सित सातें सावन आई, शिवनारि वरी जिनराई। सम्मेदाचल हरि माना, हम पूर्जे मोक्ष कल्याना ।। ॐ ह्रीं श्ररवणशुक्लसप्तम्यां मोक्षमंगलमंडिताय श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय अर्धे निवेः

पार्श्वनाथ जिनराज का, स्वर्ण भद्र है कूट । मन वच तन कर पूजहूँ, जाऊं करम से छूट ।। ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राद ि 82 करोड़ 84 लाख 45 हजार 742 मुन ि इस परमपुनीत कूट से मोक्ष पधारे हैं तिनके चरणारविन्द को मेरा मन वचन काय से बारम्बार नमस्कार हो जलाद ि अर्ध निर्वपामिति स्वाहा ।।

एक बार इस कूट को शुद्ध भाव से ध्यान व दर्शन करने से पशु गति से छुटकारा हो जाता है और 16 करोड़ उपवास का फल एक दफा भाव सहित वंदना करने से होता है।

सम्मेद शिखरजी यात्रा

दिन 1 शिखरजी-रुजुवालिका-गिरिडीह-भागलपुर-चंपापुर

आरंभ: शिखरजी सुबह 5:00 बजे

  • रुजुवालिका: इस शांत स्थान का भ्रमण करें, जहाँ माना जाता है कि भगवान महावीर ने केवलज्ञान (सर्वज्ञता) प्राप्त किया था। ध्यान और चिंतन में समय व्यतीत करें।
  • गिरिडीह: प्रमुख जैन मंदिरों के दर्शन करें और मनोरम दृश्यों का आनंद लें। गिरिडीह अपने शांत वातावरण और आध्यात्मिक महत्व के लिए जाना जाता है।
  • भागलपुर: भागलपुर अपने प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। दोपहर का भोजन करें और आसपास के इलाकों का भ्रमण करें।
  • चंपापुर: जैन धर्म के पांच पंच कल्याणक मंदिरों में से एक चंपापुर पहुंचें । यह मंदिर भगवान वासुपूज्य के केवलज्ञान से जुड़ा हुआ है । जैन मंदिर परिसर में दर्शन करें और शाम की प्रार्थना में शामिल हों।

रात भर रुकना : होटल / धर्मशाला

दिन 2 चंपापुर-लछुआर-गुनावा-पावापुरी

शुरुआत: चंपापुर, सुबह 5:00 बजे

  • लछुआर: जैन इतिहास से जुड़े एक प्रमुख तीर्थ स्थल, लछुआर जैन मंदिर परिसर का दर्शन करें।
  • गुनावा: गुनावा जैन मंदिर का दर्शन करें, जहां भगवान महावीर ने उपदेश दिए थे। कुछ समय भक्ति भाव से व्यतीत करें।
  • पावपुरी: पावपुरी पहुंचें, वह पवित्र स्थान जहां भगवान महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया था । कमल के तालाब से घिरे जल मंदिर और समोशरण मंदिर के दर्शन करें।

रात भर रुकना : होटल / धर्मशाला

तीसरा दिन पावापुरी-कुंडलपुर-नालंदा-राजगीर

शुरुआत: पावापुरी, सुबह 10:00 बजे

  • कुंडलपुर: भगवान महावीर की जन्मभूमि कुंडलपुर की यात्रा करें। मंदिर परिसर और आसपास के शांत क्षेत्रों का भ्रमण करें।
  • नालंदा: प्राचीन विश्वविद्यालय और जैन एवं बौद्ध विरासत स्थल नालंदा महाविहार का अन्वेषण करें।
  • राजगीर: जैन धर्म के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल राजगीर में अपने भ्रमण का समापन करें। ग्रिधकूट पहाड़ियों का दर्शन करें, जहां भगवान महावीर ने ध्यान किया था, और अन्य जैन मंदिरों को भी देखें।

यात्रा का समापन: राजगीर में
हमारी सेवाओं का अंत

हमें संपर्क करें +91 98111 75768

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